जानिए जिस रावण ने कैलाश को उठा लिया था फिर वह एक धनुष क्यों नहीं उठा पाया

जिस रावण ने कैलाश को उठा लिया था फिर वह एक धनुष क्यों नहीं उठा पाया

अक्सर लोगों के मन में यह सवाल आता है कि जब रावण कैलाश पर्वत उठा सकता है तो शिव का धनुष कैसे नहीं उठा पाया

दशानन रावण बहुत शक्तिशाली और प्रचंड विद्वान व्यक्ति था कहते हैं उन्हें सभी वेदों का ज्ञान था! उनसे ज्यादा विद्वान व्यक्ति उस समय कोई नहीं था! जिसके चलते उन्होंने भगवान शिव के निवास स्थल कैलाश को भी उठा लिया था! कैलाश पर्वत को उठाना उनकी शक्ति का प्रदर्शन था! परंतु इतना शक्तिशाली होने के बावजूद भी आखिर सीता स्वयंवर में महाबली रावण शिव धनुष को क्यों नहीं उठा पाया? यह बात हर किसी को आश्चर्य में डालती है! क्योंकि जिसने भगवान शिव के कैलाश पर्वत को उठा लिया हो उसके लिए एक धनुष उठाना तो आम बात है! फिर आखिरकार क्यों नहीं उठा पाया धनुष?

बता दे, भगवान भोलेनाथ का धनुष बहुत ही शक्तिशाली था, जिस के टंकार से पर्वत हिल जाते थे बादल फटने लगते थे! इस धनुष से चले 1 बाण ने त्रिपुरासुर कि तीनों नगरी को ध्वस्त कर दिया था! इसके बाद यह धनुष देवताओं के राजा इंद्र को दिया गया जिसे बाद में उन्होंने राजा जनक के पूर्वज नीमी को दे दिया! तभी से यह धनुष मिथिला में स्थित है! इस धनुष का नाम पिनाक था। देवी और देवताओं के काल की समाप्ति के बाद इस धनुष को देवराज इन्द्र को सौंप दिया गया था। देवताओं ने राजा जनक के पूर्वज देवराज को दे दिया। राजा जनक के पूर्वजों में निमि के ज्येष्ठ पुत्र देवराज थे। शिव-धनुष उन्हीं की धरोहरस्वरूप राजा जनक के पास सुरक्षित था।

अचानक एक बार देवी सीता ने बाल्यावस्था में खेलकूद में उस धनुष को उठा लिया! जिसे देखकर देवी सीता के पिता महाराज जनक भी आश्चर्यजनक रह गए! तभी से राजा जनक ने मन ही मन प्रतिज्ञा ली कि जो इंसान इस धनुष को उठाएगा उस पर प्रत्यंचा चढ़ाएगा, उसी के साथ सीता का स्वयंवर होगा!

जिसके उपरांत जब देवी सीता विवाह योग्य हुई तो राजा जनक ने सीता स्वयंवर रखा! जिसमें उस समय की महान और बलशाली राजाओं ने भाग लिया! उस समय आए राजाओं में शक्तिशाली रावण भी मौजूद थे! परंतु कोई भी धनुष को हिला नहीं सका! ऐसे में रावन उठे और धनुष को हिलाने लगे लेकिन उन पर भी धनुष इधर से उधर नहीं हुआ! यह वही रावण थे जिन्होंने कैलाश पर्वत को भी उठा दिया था! परंतु जैसे ही भगवान श्री राम धनुष को उठाने चले तो उन्होंने एक ही झटके में धनुष उठा दिया, प्रत्यंचा चढ़ा दी और धनुष तोड़ दिया!

राम चरितमानस में एक चौपाई आती है:-“उठहु राम भंजहु भव चापा, मेटहु तात जनक परितापाI”

भावार्थ- गुरु विश्वामित्र जनकजी को बेहद परेशान और निराश देखकर श्री रामजी से कहते हैं कि हे पुत्र श्रीराम उठो और “भव सागर रुपी” इस धनुष को तोड़कर, जनक की पीड़ा का हरण करो।”इस चौपाई में एक शब्द है ‘भव चापा’ अर्थात इस धनुष को उठाने के लिए शक्ति की नहीं बल्कि प्रेम और निरंकार की जरूरत थी।

यह मायावी और दिव्य धनुष था। उसे उठाने के लिए दैवीय गुणों की जरूरत थी। कोई अहंकारी उसे नहीं उठा सकता था।क्योंकि वहां मौजूद राजाओं के अंदर अहंकार भरा हुआ था! जिसके चलते रावण और अन्य राजा उस धनुष को हिला भी नहीं पाए!

रावण एक अहंकारी मनुष्‍य था। वह कैलाश पर्वत तो उठा सकता था लेकिन धनुष नहीं। धनुष को तो वह हिला भी नहीं सकता था। वन धनुष के पास एक अहंकारी और शक्तिशाली व्यक्ति का घमंड लेकर गया था। रावण जितनी उस धनुष में शक्ति लगाता वह धनुष और भारी हो जाता था। वहां सभी राजा अपनी शक्ति और अहंकार से हारे थे।

जब प्रभु श्रीराम की बारी आई तो वे समझते थे कि यह कोई साधारण धनुष नहीं बल्की भगवान शिव का धनुष है। इसीलिए सबसे पहले उन्हों धनुष को प्रणाम किया। फिर उन्होंने धनुष की परिक्रमा की और उसे संपूर्ण सम्मान दिया। प्रभु श्रीराम की विनयशीलता और निर्मलता के समक्ष धनुष का भारीपन स्वत: ही चिन्हित हो गया और उन्होंने उस धनुष को प्रेम पूर्वक उठाया और उसकी प्रत्यंचा चढ़ाई और उसे झुकाते ही धनुष खुद ब खुद टूट गया।

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