शिव और शक्तिः शक्ति पीठ के बनने की कहानी !!

शिव की सती से शादी कराने का षडयंत्र

योगिक कथाओं में, कहानी इस प्रकार चलती है कि शिव निश्चलता से नृत्य में, और नृत्य से निश्चलता में जाने लगे। दूसरा हर कोई, गंर्धव, यक्ष, तीनों संसार के देवता मोहित होकर उन्हें कौतूहल से देखने लगे। उन्होंने इस चरम गतिविधि और चरम निश्चलता का आनंद लिया, लेकिन उन्हें उनके अनुभव की प्रकृति का कोई अंदाज नहीं था। वे इसका स्वाद चखना चाहते थे।

कौतूहल से उनमें रुचि जगी। रुचि होने से उन्होंने उनके थोड़े निकट आने की कोशिश की, लेकिन वे उनके नृत्य की प्रचंडता या निश्चलता की तीव्रता को सहन नहीं कर सके।

उन्होंने योजना बनानी शुरू की कि शिव जिस अनुभव से गुजर रहे थे, उस पर वे कैसे पकड़ बनाएं। उन्होंने एक सम्मेलन बुलाया जो धीरे-धीरे एक षडयंत्र में बदल गया। उन्होंने तय किया कि किसी तरह उनकी शादी करा दें। ‘हमारे पास अपनी तरफ से कोई ऐसा होना चाहिए जो हमें यह बता पाए कि ऐसे परमानंद के अनुभव का, ऐसे उल्लास का, और साथ ही ऐसी मृत्यु सरीखी निश्चलता का आधार क्या है। वे इन दोनों का आनंद लेते हुए लगते हैं। हमें अंदर का एक व्यक्ति चाहिए।’

कई चीजें हुईं – मैं उस षडयंत्र के पूरे विस्तार में नहीं जाऊंगा, क्योंकि ये एक बहुत बड़ा षडयंत्र था। अगर आप शिव के अंदर का दृष्य जानना चाहते हैं, तो उसके लिए जबरदस्त षडयंत्र की जरूरत है। जिसकी उन्होंने योजना बनाई, युक्ति निकाली और उसे कार्यान्वित किया। तो उन्होंने शिव की शादी सती से करा दी। वे झुक गए और वो पूरी तरह से प्रेम में पड़कर सती के लिए बिलकुल दीवाने हो गए।

सती के पिता ने शिव का अपमान किया

उन्होंने सती को अपने जीवन का एक अंग बना लिया। लेकिन सती के पिता को शिव से घृणा थी, क्योंकि उनका दामाद एक राजा नहीं था, वह अच्छे से कपड़े नहीं पहनता था, वह अपने शरीर पर भस्म लगाता था, वह मानव खोपड़ी में भोजन करता था, उसके सारे मित्र हर तरह के बेताल, भूत और पिशाच थे। वह हमेशा या तो ध्यान में रहता था या नशे में रहता था। उसकी आंखें या तो मुंदी रहती थीं या वह तांडव करता था। यह कोई गर्व करने या आस-पास होने योग्य दामाद नहीं था।

कुछ समय बाद, दक्ष एक महान यज्ञ करना चाहता था जिसमें उसने हर राजा, हर देवता, और हर यक्ष को बुलाया। लेकिन उसने शिव को निमंत्रण नहीं दिया। शिव और सती जंगल में बैठे थे और वह प्रेमवश शिव को जंगल के फल खिला रही थीं क्योंकि वह यही खाते थे। उनके पास कोई घर या खाना पकाने की उचित सुविधा नहीं थी, तो वे बस फल या जो कुछ भी भेंट में आता था, उसे खाते थे।

तब सती ने बहुत से लोगों को जाते हुए देखा, सुंदर रथों में सारे राजा, देवता और देवियां सज-धजकर कहीं जा रहे थे। तब उन्होंने शिव से पूछा, ‘ये क्या है? हर कोई कहां जा रहा है?’ शिव ने कहा, कोई बात नहीं। हमें भी वहां जाने की जरूरत नहीं है जहां वे जा रहे हैं।’ लेकिन वह बहुत उत्सुक हो गईं। ‘हर कोई कहां जा रहा है? देखिए उन्होंने कैसे कपड़े पहने हुए हैं। ये क्या हो रहा है?’ उन्होंने कहा, ‘परेशान मत हो, हम यहां खुश हैं, क्या तुम नाखुश हो? नहीं। तुम खुश हो। उनके बारे में चिंता मत करो।’ क्योंकि वे जानते थे कि क्या हो रहा है।

लेकिन उनकी उत्सुकता और नारीसुलभ उत्तेजना उन्हें बस यूं ही बैठे रहने और पेड़ के फलों का आनंद नहीं लेने दे रही थी। वह बाहर निकलीं और एक रथ को रोककर उनसे पूछा, ‘आप सब कहां जा रहे हैं?’ उन्होंने कहा, ‘आप नहीं जानतीं? आपके पिता एक विशाल यज्ञ – एक अर्पण – कर रहे हैं और उन्होंने हम सब को बुलाया है। क्या आप नहीं आ रही हैं?’ उन्हें बहुत दुःख हुआ जब उन्हें पता चला कि उनको और उनके पति को नहीं बुलाया गया है। उन्हें अपमान महसूस हूआ। उन्होंने सोचा कि यह शिव के साथ अन्याय है। उन्होंने शिव से कहा, ‘मैं अपने पिता के पास जा रही हूं। उन्होंने ऐसा क्यों किया?’ शिव ने कहा, ‘मुझे इससे फर्क नहीं पड़ता, तुम उसके लिए क्यों परेशान हो रही हो? हम यहां ठीक हैं। हमें उनके यज्ञ में क्यों जाना चाहिए?”

लेकिन उन्हें न बुलाए जाने के इस अपमान से बहुत चोट पहुंची। उन्होंने कहा, ‘नहीं, मुझे जाना होगा। जरूर कोई गलती हुई है। हो सकता है कि निमंत्रण पत्र खो गया हो। ये नहीं हो सकता। वे आपको और मुझ कैसे नहीं बुला सकते? मैं उनकी बेटी हूं। जरूर कोई गलती हुई होगी। मुझे यकीन है कि वे ऐसा नहीं करेंगे। मेरे पिता ऐसे नहीं हैं।’ शिव ने कहा, ‘मत जाओ।’ लेकिन वह उनकी सुनने वाली नहीं थीं और वह चली गईं।

सती खुद को यज्ञ की अग्नि में जला डाला

जब सती उत्सव में गईं, उन्होंने पाया कि उनकी सारी चचेरी बहनें और हर कोई, जिसकी थोड़ी भी प्रतिष्ठा थी, वहां पर था, पूरी तरह से सजकर। लेकिन वह अपने साधारण कपड़ों में आई थीं, जिन कपड़ों में वह पहाड़ पर रहती थीं। तो लोगों ने उनका मजाक बनाया और उन पर हंसे। उन्होंने पूछा, आपका वो भस्म-लगाए आदमी कहां है? वो आदमी कहां है जिसने न जाने कितने समय से अपने बालों में कंघी नहीं की है?’

उन्होंने उस सब को अनदेखा कर दिया और वह अपने पिता से मिलने गईं, अब भी उन्हें यकीन था कि कोई गलती हुई है। जब उन्होंने पिता को देखा, तो दक्ष बहुत गुस्सा हो गया। लेकिन सती ने पूछा, ‘आप शिव को आमंत्रित कैसे नहीं कर सकते?’ तब शिव ने हर संभव तरीके से शिव को गाली दी और कहा, ‘मैं उसे कभी अपने घर में कदम नहीं रखने दूंगा।”

वह बहुत निराश हुईं। यज्ञ की अग्नि जल रही थी। वह बस उसके अंदर चली गईं और खुद को जला डाला। नन्दी और कुछ दूसरे जो उनके पीछे गए थे, जब उन्होंने यह होते देखा, तो वे इतने भयभीत हो गए कि वे दौड़ते हुए शिव के पास वापस आए और उन्हें बताया कि सती ने खुद को हवनकुंड में जला दिया है, क्योंकि दक्ष ने उनका अपमान किया था।

शिव ने वीरभद्र को पैदा किया

शिव कुछ समय के लिए निश्चलता में बैठे। फिर वह आग बन गए। वह क्रोध में बस खड़े हो गए। शिव ने अपने उलझे बालों की एक लट तोड़ी और उसे अपने पास की एक चट्टन पर पटक दिया और एक बहुत शक्तिशाली प्राणी पैदा कर दिया जिसका नाम वीरभद्र था। उन्होंने वीरभद्र से कहा, ‘जाओ यज्ञ को नष्ट कर दो। उससे किसी को कुछ प्राप्त नहीं होना चाहिए, दक्ष को भी। कोई भी और जो भी इस यज्ञ में शामिल है, उन्हें जाकर नष्ट कर दो।’ वीरभद्र पूरे क्रोध में गया और उस यज्ञ का विध्वंस कर दिया, जो भी उसके रास्ते में आया, उसने हर किसी को मार डाला, और सबसे बढ़कर, दक्ष को भाले से बेध दिया।

शक्ति स्थलों का बनना

तब शिव आए, उन्होंने सती के आधे जले शरीर को उठा लिया और उनका दुःख शब्दों से परे था। वह उन्हें अपने कंधे पर डालकर चल दिए। वह जबरदस्त क्रोध और दुःख में चलते रहे। वह शरीर को नीचे नहीं रख रहे थे, और न ही लपटों को उनके शरीर को जलाने दे रहे थे या उन्हें दफना रहे थे। वह बस चलते रहे। जैसे-जैसे वह चलते गए, सती का शरीर सड़ने लगा और टुकड़े-टुकड़े होकर गिरने लगा और यह 54 अलग-अलग स्थान पर गिरा। ये 54 स्थान भारत में शक्ति स्थल के रूप में विकसित हुए। जैसे उनके शरीर का हर एक हिस्सा गिरा, शक्ति का एक गुण वहां स्थापित हो गया। ये देवी के मुख्य मंदिर हैं।

उनमें से तीन गुप्त माने जाते हैं और वे कहा हैं उसे कुछ लोगों के सिवाय कोई नहीं जानता, लेकिन 51 स्थल लोगों को पता हैं।

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