दीदी का सरकार में वापसी का ‘बैकअप’ प्लान, कौन सा है वो किला जिसे भेदने में हर कोई रहा नाकाम

पश्चिम बंगाल के लोकसभा चुनाव की 42 सीटों में से बीजेपी ने 18 सीटें जीतकर तृणमूल कांग्रेस को हैरान करके रख दिया. विधानसभा वार अगर इसे देखें तो बीजेपी ने 121 विधानसभा सीट और टीएमसी ने 164 पर बढ़त बनाई. पश्चिम बंगाल में सरकार बनाने के लिए 147 विधानसभा सीट चाहिए.

पश्चिम बंगाल में बीजेपी की तरफ से पूरी ताकत झोंकने के बाद इस बार का विधानसभा चुनाव बेहद दिलचस्प मोड़ लेता जा रहा है. बीजेपी ने ममता के किले में सेंधमारी की कोशिश करते हुए अमित शाह के बंगाल दौरे के वक्त टीएमसी, लेफ्ट और कांग्रेस के कई बड़े नेताओं को अपने खेमें में औपचारिक तौर पर शामिल कराया. इसमें सबसे बड़ा नाम है शुभेंदु अधिकारी है, जो पश्चिम बंगाल की वर्तमान सरकार में मंत्री थे और वे ऐसे परिवार से आते हैं जिनका पूर्वी मिदनापुर जिले में काफी गहरा राजनीतिक प्रभाव माना जाता है.

अधिकारी लोकसभा सांसद रहे हैं और टीएमसी के टिकट पर नंदीग्राम विधानसभा से विधायक चुने गए, जो जमीनी अधिग्रहण के खिलाफ संघर्ष का केन्द्र बना और इसके चलते लेफ्ट की 34 साल पुरानी सरकार चली गई थी. और लेफ्ट को 2011 और 2016 में ममता बनर्जी के हाथों करारी शिकस्त का सामना करना पड़ा था. आइये बताते हैं बीजेपी अब तक बंगाल में कहां पर सेंधमारी नहीं कर पाई है अगर बंगाल में बीजेपी को सत्ता में आना है तो ममता के उस गढ़ में सेंधमारी की चुनौती होगी और क्या सोचते हैं इस पर राजनीतिक विश्लेषक प्रदीप सिंह.

BJP के लिए ‘साउथ बंगाल’ के किले को भेदना जरूरी

देश के बड़े और अधिक आबादी वाले राज्यों में से एक पश्चिम बंगाल में भौगोलिक तौर पर विविधताएं हैं. राज्य को मुख्य तौर पर पांच भागों में बांटा जा सकता है. पर्वतीय और तलहटी क्षेत्र जिनमें दार्जिलिंग, कूच बेहार और जलपाईगुड़ी. इसके बाद मालदा के उत्तर जिले, नॉर्थ और साउथ दिनाजपुर. मुर्शिदाबाद और बीरभूम जो राज्य के मध्य क्षेत्र में हैं. पश्चिमी मिदनापुर के तीन जिले, पुरुलिया और बांकुड़ा को जंगलमहल कहा जाता है. हालांकि, सबसे बड़ा उप-क्षेत्र है साउथ बंगाल, इसे ग्रेटर कोलकाता रिजन भी कहा जाता है.
2019 चुनाव में भी बीजेपी नहीं कर पाई थी साउथ बंगाल में सेंधमारी
पश्चिम बंगाल के लोकसभा चुनाव की 42 सीटों में से बीजेपी ने 18 सीटें जीतकर तृणमूल कांग्रेस को हैरान करके रख दिया. विधानसभा वार अगर इसे देखें तो बीजेपी ने 121 विधानसभा सीट और टीएमसी ने 164 पर बढ़त बनाई. पश्चिम बंगाल में सरकार बनाने के लिए 147 विधानसभा सीट चाहिए. हालांकि, बीजेपी ने 2014 और 2019 में शानदार प्रदर्शन किया लेकिन तृणमूल कांग्रेस साउथ और सेंट्रल बंगाल में वापसी करने में सफल रही, जिसे उसका पारंपरिक गढ़ माना जाता है.
बीजेपी ने 2019 जिन 121 में से 67 विधानसभा सीटों पर बढ़त बनाई वे पहाड़ी, नॉर्थ बंगाल, और जंगलमहल सब-रिजन की 94 विधानसभा सीटों में आई हैं. सेंट्रल की 33 और साउथ बंगाल की 167 विधानसभा सीटों में से बीजेपी सिर्फ 6 और 48 सीटें जीतने में कामयाब रही. जबकि, टीएमसी ने 2019 के चुनाव में यहां की 167 विधानसभा सीटों में से साउथ बंगाल की 119 सीटों में जीतने में कामयब रही. अगर टीएमसी साउथ बंगाल में अपने गढ़ को बचाए रखती है तो टीएमसी के फिर से सत्ता में आने की उम्मीद बनी रहेगी.
साउथ बंगाल में बीजेपी का खास जोर
राजनीतिक विश्लेषक प्रदीप सिंह की मानें तो बीजेपी लगातार ममता के गढ़ में सेंधमारी के लिए उस इलाके के लोगों को तोड़ रही है. मुकुल रॉय ने जमीनी स्तर से पार्टी को खड़ा किया है. शुभेंदु अधिकारी ने आंदोलन खड़े किए हैं कि आखिर कैसे ग्राउंड लेवल पर टीएमसी को कमजोर किया जाए.
बीजेपी ने कैसे बदली बंगाल में रणनीति
प्रदीप सिंह कहना है कि पिछले 2016 के बंगाल विधानसभा चुनाव के वक्त बीजेपी के पास बूथ लेवल के वर्कर नहीं थे. आज 72 हजार बूथ हैं, इनमें से 65 हजार बूथ पर कार्यकर्ता नियुक्त हो चुके हैं. पहले इसके लिए संगठन के लोगों को जिम्मेदारी दी गई और उसके बाद 7 मंत्रियो को लगाया गया. अमित शाह सबसे कमजोर इलाके पर फोकस कर रहे हैं.
उन्होंने कहा कि साल  2016 के चुनाव में बीजेपी को बोलपुर में एक भी सीट नहीं आई. लेकिन अब पार्टी की रणनीति बदल चुकी है. बंगाल में अमित शाह के रोड शो को लेकर प्रदीप सिंह का कहना है कि बंगाल में पहले कभी ऐसा रोड शो नहीं हुआ. जबकि, प्रधानमंत्री मोदी अभी खुद मैदान में नहीं उतरे हैं. उन्होंने कहा कि बीजेपी जिस ताकत के साथ बंगाल में उतर रही है, ऐसा असर यूपी में भी नहीं बना था.
बंगाल पूर्वी भारत का मजबूत किला
प्रदीप सिंह का कहना है कि बंगाल पूर्वी भारत का सबसे मजबूत किला है. अगर इसे बीजेपी कब्जा करने में कामयाब रहती है तो नॉर्थ और वेस्ट की पार्टी उसके पास पहले से थी. नॉर्थ-ईस्ट में पहुंच है ही. सिर्फ ओडिश एकमात्र राज्य रह जाएगा. इसके बाद बीजेपी का सारा जोर दक्षिण पर रह जाएगा. उन्होंने कहा कि अभी बंगाल चुनाव के पांच महीने हैं. ऐसे में बीजेपी इस कमी को पूरा करने की कोशिश कर रही है.
ममता को दोहरी चुनौती
उनका कहना है कि इस चुनाव में ममता दोहरी चुनौती से जूझ रही है. एक तरफ जहां लोग टीएमसी छोड़कर जा रहे हैं, ऐसे में जहां उसे अपने घर को बचाने की चुनौती है तो वहीं दूसरी तरफ सत्ता में वापसी की. जबकि, बीजेपी हाल में बिहार और हैदराबाद में शानदार प्रदर्शन किया है और उसके कार्यकर्ताओं के हौसले पूरी तरह से बुलंद है. उन्होंने कहा कि हालांकि, चुनाव में जीत की कभी भविष्यवाणी नहीं की जा सकती है उसके बावजूद 2021 के बंगाल विधानसभा चुनाव में कांटे का टक्कर रहेगा.

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