वसुंधरा विरोधी की भाजपा में वापसी!:कांग्रेस छोड़ सकते हैं जसवंत सिंह के बेटे मानवेंद्र, पर भाजपा में राह आसान नहीं

भाजपा के संस्थापक सदस्य और कद्दावर नेता रहे पूर्व केंद्रीय मंत्री जसवंत सिंह जसोल के बेटे मानवेंद्र सिंह का कांग्रेस से मोहभंग होता नजर आ रहा है। पार्टी में लगातार होती उपेक्षा से आहत मानवेंद्र एक बार फिर अपनी पुरानी पार्टी भाजपा से पींगे बढ़ा रहे हैं। पार्टी में उनकी सम्मानजनक वापसी की सुगबुगाहट तेज होती जा रही है। बताया जा रहा है कि भाजपा इन दिनों वसुंधरा राजे के धुर विरोधी नेताओं को वापस जोड़कर पार्टी का आधार मजबूत करने में जुटी है।

हालांकि, मानवेंद्र ने इस बारे में चुप्पी साध रखी है। उनके करीबी लोगों का कहना है कि कुछ दिन में सबकुछ स्पष्ट हो जाएगा। मानवेंद्र वसुंधरा राजे के धुर विरोधी माने जाते हैं। पिछला विधानसभा चुनाव भी उन्होंने वसुंधरा राजे के खिलाफ लड़ा था।

कांग्रेस से इस कारण हुआ मोहभंग
पिछले विधानसभा चुनाव (2018) से पहले मानवेंद्र ने पचपदरा में अपने समर्थकों के साथ बड़ा सम्मेलन कर यह कहते हुए भाजपा छोड़ दी- कमल का फूल हमारी भूल। इसके बाद वे कांग्रेस में शामिल हो गए। विधानसभा चुनाव में उन्होंने कांग्रेस से तीन टिकट मांगे की, लेकिन पार्टी ने उनकी पत्नी समेत किसी समर्थक को टिकट नहीं दिया, बल्कि उन्हें वसुंधरा राजे के सामने बलि का बकरा बनाकर चुनाव में उतार दिया।

यहीं से मानवेंद्र के मन में आक्रोश पनपना शुरू हो गया। लोकसभा चुनाव के दौरान भी पार्टी मानवेंद्र का सही तरीके से इस्तेमाल नहीं कर पाई। हाल ही हुए जिला परिषद और पंचायत समितियों के चुनाव में भी उनको तव्वजो तो दूर, उनसे पूछा तक नहीं गया। इसके बाद कांग्रेस में अकेले पड़ चुके मानवेंद्र के सामने और कोई विकल्प नहीं रह गया।

कांग्रेस से गए तो क्या असर पड़ेगा?
जसवंत सिंह का राजपूत समाज पर गहरा प्रभाव रहा था। अभी भी समाज के लोग मानवेंद्र से उम्मीद लगाए बैठे हैं। एक बार सांसद और एक बार विधायक रह चुके मानवेंद्र का बाड़मेर और जैसलमेर समेत जोधपुर और जालोर क्षेत्र में अच्छी पकड़ है। उनके कांग्रेस छोड़ने से इसका सीधा लाभ भाजपा को मिलेगा।

इस कारण नहीं हो पाया कांग्रेस में इस्तेमाल
मानवेंद्र कांग्रेस में रहकर मारवाड़ में जाट आधारित राजनीति में सहज महसूस नहीं कर पा रहे थे। बाड़मेर के स्थानीय नेता उनके विरोध में डटे थे। स्थानीय नेताओं के विरोध के कारण विधानसभा चुनाव में उनकी पत्नी चित्रा को टिकट नहीं मिल पाया।

…लेकिन भाजपा में राह आसान नहीं
मानवेंद्र भाजपा में सम्मानजनक वापस की कोशिश में जुटे हैं, लेकिन यह राह उतनी आसान नहीं है। भाजपा के लिए बाड़मेर-जैसलमेर या फिर जोधपुर की राजनीति में मानवेंद्र को एडजस्ट करना अब इतना आसान नहीं रहा। जोधपुर में केंद्रीय जलशक्ति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत एक राजपूत नेता के रूप में अपने पांव जमा चुके हैं। वहीं, बाड़मेर-जैसलमेर के सांसद रह चुके मानवेंद्र के स्थान पर अब केंद्रीय कृषि राज्य मंत्री कैलाश चौधरी काबिज हो चुके हैं। ऐसे में भाजपा में स्थानीय स्तर पर भी मानवेंद्र को विरोध का सामना करना पड़ सकता है।

उनके लिए अपने पूर्व शिव विधानसभा क्षेत्र के अलावा अन्य विकल्प बहुत सीमित रह गए हैं। वहीं, भाजपा में मुख्यमंत्री बनने की होड़ में शामिल शेखावत नहीं चाहेंगे कि एक और प्रभावशाली राजपूत नेता पार्टी में अपने कदम जमाए। ऐसे में देखने वाली बात होगी कि भाजपा उनको कितना सम्मान दे पाएगी।

वसुंधरा से है जोरदार नाराजगी
वसुंधरा राजे के मुख्यमंत्री बनते ही दोनों परिवारों के बीच रिश्तों में कड़वाहट आना शुरू हो गई। वसुंधरा ने जसवंत सिंह को तव्वजो देना बंद कर दिया। हालात ऐसे पैदा हो गए कि जसवंत सिंह का फोन तक उठाना बंद कर दिया। इस बीच जोधपुर में एक व्यक्ति ने वसुंधरा का मंदिर बनाने की कोशिश की। जसवंत की पत्नी शीतल कंवर ने देवी-देवताओं का अपमान बता इसके खिलाफ केस दर्ज करवा दिया। यहां से दोनों परिवारों के बीच आई कड़वाहट सार्वजनिक हो गई और रिश्तों में दूरियां काफी बढ़ गई।

जसवंत के पैतृक गांव जसोल में आयोजित एक सामाजिक समारोह में भाजपा के कुछ नेता शामिल हुए। वसुंधरा विरोधी इन नेताओं का स्वागत जसवंत ने मारवाड़ी परंपरा से अफीम की मनुहार से किया। इस मामले ने तूल पकड़ लिया। वसुंधरा के इशारे पर आयोजकों के खिलाफ मामला दर्ज हुआ। यह मामला भी कई दिन तक सुर्खियों में रहा।

वसुंधरा का आखिरी प्रहार
दोनों परिवारों के बीच जारी तनातनी के बीच 2014 के लोकसभा चुनाव से काफी पहले जसवंत ने घोषणा कर दी कि यह उनका अंतिम चुनाव होगा। ऐसे में वे अपने खुद के संसदीय क्षेत्र बाड़मेर-जैसलमेर से चुनाव लड़ेंगे। चुनाव से एन पहले वसुंधरा ने पासा फेंका और जसवंत की बाजी पलट चुकी थी। कांग्रेस के सांसद कर्नल सोनाराम चौधरी को वसुंधरा भाजपा में ले आई और आलाकमान से जिद कर उन्हें टिकट दिला दी। जसवंत खाली हाथ रह गए। उन्होंने इस पीठ में छुरा भोंकने के समान बताया। इसके साथ ही उन्होंने निर्दलीय चुनाव लड़ने की घोषणा कर दी। देश के सबसे चर्चित चुनाव में से एक इस संसदीय क्षेत्र से जसवंत को हार का सामना करना पड़ा। इसके कुछ महीने बाद न केवल जसवंत, बल्कि दोनों परिवार के रिश्ते भी कोमा में चले गए।

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